"ये तो लड़की है इसे किडनी कौन देगा" ज्योति ने माँ बाप को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया

Thu, 08/01/2019 - 02:19

जब अपने ही माँ बाप संवेदनहीन हो जायें तो आप समाज और दूसरों से क्या ही उम्मीद कर सकते है। बिहार के शेखपुरा जिले के अवगिल गांव की सोलह वर्षीय ज्योति कुमारी ने बुधवार की शाम को पटना के सरकारी हॉस्पिटल में दम तोड़ दिया। ज्योति पिछले कुछ समय से गुर्दे की बीमारी से संघर्ष कर रही थी या यूँ कहें की अपने मरने का इंतज़ार कर रही थी।

ज्योति कुमारी ने बीमारी के बाद भी हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। परीक्षा पास करने के बाद जब उनकी तबियत ज्यादा ख़राब हुई तो घर वाले सरकारी हॉस्पिटल ले गए जंहा से उन्हें इंदिरा गाँधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस ले जाया गया।

वंहा डॉक्टरों ने जब ये बताया की ज्योति की दोनों किडनी ख़राब हो चुकी है और जान बचाने के लिए तुरंत ही किडनी का प्रत्यर्पण करना जरूरी है तो माँ बाप जिनसे आप की ऐसे समय में सबसे ज्यादा उम्मीद होती है उन्होंने ये कहते हुए किडनी देने से मना कर दिया की "ये तो लड़की है इसे किडनी कौन देगा"

उसके बाद गौतम नाम के एक शख्स ने अपनी किडनी देने के लिए जब कहा तो ज्योति के माँ बाप ने डॉक्टरों से पूरे खर्चे की जानकारी ली। जब डॉक्टरों ने लगभग पांच लाख रूपये का खर्च बताया और साथ ही कहा की उसके बाद भी ठीक होने की 100 प्रतिशत गारंटी नहीं है तो पिता रामाश्रय यादव हॉस्पिटल से छुट्टी करा के घर चले गए।

घर पहुंचने के बाद ज्योति की तबियत दिन प्रतिदिन ख़राब होती गयी। मीडिया में खबर छपने के बाद लोकल प्रशासन जागा और जिलाधिकारी ने पिता को बुला का समझाया बुझाया जिसके बाद वो ज्योति को किडनी देने के लिए राजी हुआ। मीडिया में खबर आने के बाद देश विदेश से तमाम सहायता समूहों और लोगों से इलाज में मदद के लिए संपर्क किया लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

तबियत ज्यादा बिगड़ने पर ज्योति को इंदिरा गाँधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस लाया गया जंहा किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा है पर हॉस्पिटल ने बेड उपलब्ध न होने का हवाला दे कर उसे भर्ती करने से इंकार कर दिया। उसके माता पिता उसे मगध के जिला हॉस्पिटल ले गए जंहा उसे पटना मेडिकल कॉलेज ये कहते हुए रेफेर कर दिया गया की मगध में किडनी के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है।

ज्योति ने कल बुधवार शाम को अपने माता पिता, इस समाज और हॉस्पिटलों के गैर जिम्मेदार लोगों को उनकी तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए आखिरी साँस ली।

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