अखिलेश की समाजवादी पार्टी: नए पैकेट में पुराना सामान

shashank trivedi's picture
shashank trivedi Thu, 01/19/2017 - 12:32 Samajwadi party, Akhilesh yadav

सोमवार को चुनाव आयोग के चुनाव चिन्ह संबधी फैसला आने के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया के रुप में अखिलेश यादव के नाम पर मुहर लग गई । अपनी परिवारवादी राजनीति के कारण मीडीया में अक्सर ‘ उत्तर प्रदेश के प्रथम परिवार के नाम से संबोधित किए जाने वाले यादव परिवार में बीते कुछ समय से लगातार संघर्ष की स्थिति थी । अखिलेश यादव गुट को साईकिल चुनाव चिन्ह मिलने के बाद अब  परिवारिक कलह में निश्चित रूप से वो अब इस लड़ाई में हावी हो गए हैं । वैसे तो मुलायम सिंह यादव राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे हैं लेकिन इससे बड़ा झटका शायद ही हो कि जिस पार्टी को उन्होंने बनाया उसी से उनका नियंत्रण छीन लिया गया । अखिलेश के पार्टी में मुख्य भूमिका में आने के बाद की परिस्थति को अगर देखें तो अखिलेश यादव ने शुरुआत से ही पार्टी की छवि को साफ सुथरा बनाने की कोशिश की थी । 2012 के चुनाव में डी पी यादव को पार्टी में न लेकर अखिलेश ने इसके संकेत भी दिए थे । दूसरी तरफ उनके चाचा शिवपाल यादव की छवि अपराधियों के समर्थक के रुप में रही है ।
मुलायम सिंह यादव को समय रहते इस बारे में सचेत हो जाना चाहिए था कि राजनीति अब बदल रही है और परिवर्तन के इस दौर में आप बाहुबलियों के दम पर चुनाव नही जीत सकते । अगर आपकी पार्टी में ही एक नेता ऐसा है जिसकी छवि साफ सुथरी है और जनता उसे इस छवि के साथ स्वीकार भी कर रही है तो खुद की पार्टी को साफ करने का ये अच्छा मौका था लेकिन मुलायम सिंह ये समझने में नाकाम रहे । बीते दिनों विवाद की शुरुआत भी इसी घटना  के साथ हुई थी जब मुख्तार अंसारी को पार्टी में लेने का फैसला लिया गया और अखिलेश के इसका विरोध करते ही पार्टी में टकराव की शुरुआत हो गई । इसके बाद अखिलेश और रामगोपाल यादव को पार्टी से बाहर करने के बाद विधायकों की बैठक बुलाने पर मात्र 14 विधायकों का पँहुचना भी मुलायम सिंह यादव के लिए बड़ा संकेत था ।
अखिलेश यादव का पार्टी पर नियंत्रण न सिर्फ पार्टी को बल्कि उत्तर प्रदेश की संपूर्ण राजनीति को प्रभावित करेगा । अपने मुख्यमंत्री पद के कार्यकाल में भले ही अखिलेश की छवि एक कमजोर मुख्यमंत्री की रही हो लेकिन उन्होंने अपने ऊपर भ्रष्टाचार जैसा कोई दाग नही लगने दिया है । इस पूरे घटनाक्रम के बाद वो अब और मजबूत नेता के तौर पर उभरे हैं । कांग्रेस के साथ वो अब गठबंधन भी करना चाहते हैं । एक सत्ता विरोधी लहर भी होती है इस पूरे विवाद के बाद वो थोड़ी कम हो गई है । निश्चित तौर पर अखिलेश यादव के संपूर्ण नेतत्व में सपा अब मुकाबले में वापसी करती हुई दिख रही है ।
अब सवाल इस बात का उठता है कि पार्टी की छवि साफ सुथरी करने के नाम पर पिता से बगावत करने वाले अखिलेश यादव ये काम कैसे कर पाते हैं । ये सवाल इसलिए  पैदा होता है क्योंकि पार्टी के अधिकतर मौजूदा विधायक उनके पक्ष में हैं । इन विधायकों में राममुर्ति वर्मा भी शामिल हैं जिन पर जागेंद्र सिंह की हत्या का आरोप था । बलराम सिंह .यादव जो मुख्तार अंसारी को पार्टी में लाने वाले थे वो भी अखिलेश के पक्ष मे हैं । इस तरह के कई अन्य विधायक भी हो सकते हैं जो आपराधिक मामलों में शामिल रहे हों । ऐसे में चुनाव वो जीतें या हारें लेकिन पार्टी को वो किस तरह से संभालते हैं और पार्टी उस रास्ते पर दोबारा न जाए इसके लिए वो क्या करते हैं खासतौर पर तब जब पार्टी का सिर्फ चेहरा बदला है बाकि ढाँचा वही हो ।

up
139 users have voted.

Read more

Post new comment

Filtered HTML

  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Allowed pseudo tags: [tweet:id] [image:fid]
  • Lines and paragraphs break automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.