डोनाल्ड ट्रम्प का मुस्लिम प्रतिबन्ध: आतंकवाद से लड़ाई या सिर्फ दिखावा

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shashank trivedi Wed, 02/01/2017 - 11:15 Muslim Ban, US Visa Issue

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी वायदे के अनुसार 7 मुस्लिम देशों के नागरिकों की अमेरिका में प्रवेश को निषेध कर दिया । ट्रंप के इस फैसले का अमेरिका सहित तमाम देशों बड़े स्तर पर विरोध हो रहा है । डोनाल्ड ट्रंप ने जब चुनावी वायदा किया था तब उनका कहना था कि वो आतंकवाद पर रोक लगाना चाहते हैं । इनका मानना है कि इन देशों के नागरिक अमेरिका आते हैं और आतंकवाद फैलाते हैं । अगर हम इन देशों पर नजर डाले ये हैं ,ईरान ,ईराक , सीरिया , लीबीया , यमन , सूडान । इन देशों में ईरान के साथ अमेरिका के संबंध सामान्य कभी नहीं रहे । अन्य देशों की अगर बात करें तो लगभग सारे देश ही गहयुद्ध से पीड़ित हैं और इनसे बड़ी संख्या में लोग पलायन करते रहे हैं ।

अगर हम सीरिया और लीबीया और ईराक की बात करें तो हम आसानी से देख सकते हैं कि किस तरह से अमेरिका ने इन देशों के युद्ध की आग में झोंक दिया । ईराक में किस तरह से रासायनिक हथियारों के नाम पर हमला किया गया और उसकी आड़ में तेल का शोषण किया गया । वहाँ किस तरह देखते ही देखते आइएस ने अपने कदम फैला दिए ये  और अमेरिका की भूमिका उसमें क्या थी य़ह भी एक प्रश्न है  । उस समय के संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने भी ईराक युद्ध को गैर जरुरी बताया था ।
एक धारणा है हम सभी के मन में जो ट्रंप के इस फैसले के बाद और भी मजबूत होगी कि रिपब्लिकन  डेमोक्रेट्स की अपेक्षा ज्यादा कठोर होते हैं । दरअसल ये एक भ्रम मात्र है । कोफी अन्नान अपनी किताब में लिखते हैं कि किस तरह से ईराक युद्ध की नींव एक डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के समय में ही पड़ गई थी । बराक ओबामा को भले ही नोबेल शांति पुरुष्कार से सम्मानित किया गया हो लेकिन उनके समय में भी सीरिया के संकट का  कोई राजनीतिक हल निकालने के बजाय लंबे समय तक युद्ध में फँसाए रखा गया और उन्हीं नीतियों की वजह से ही आइएस का जन्म हुआ ।

जिस फैसले को लेकर ट्रंप पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं उसकी शुरुआत भी काफी हद तक ओबामा प्रशासन ने कर दी थी । 2015 में कांग्रेस में एक बिल लाया गया था जिसके तहत फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों के नागरिक जिनके पास ईरान ,ईराक ,सूडान या सीरीया की दोहरी नागरिकता थी को इस फैसले से वंचित कर दिया गया कि वो बगैर वीजा के 90 दिनों तक अमेरिका में रूक सकते हैं । द गार्जियन ने नासा के ईरानी मूल के वैज्ञानिक के दृवारा इस फैसले को लेकर ईरानी अमेरिकियों की चिंताओ के रेखांकित किया था । डा. फिरोज नादरी नाम के इन वैज्ञानिक के अनुसार  ईरान पर से प्रतिबंध हटने के बाद अगर आप यूरोपियन देश के निवासी हैं और ईरान में बिजनेस के लिए यात्रा करना चाहते हैं साथ ही अमेरिका में भी बिजनेस करते हैं तो अमेरिका में आपके बिजनेस और यात्राओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । ये सब ओबामा के अमेरिका में हो रहा था । हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और शाहरुख खान को अमेरिका में सिर्फ मुसलमान होने के नाम पर एअरपोर्ट पर तलाशी ली गई ।

अब अगर हम ट्रंप के निर्णय की बात करें तो ये निर्णय भली भाँति समझबूझकर किया जाने वाला राजनीतिक निर्णय लगता है न कि आतंकवाद पर नकेल कसने वाला । अगर आतंकवाद को रोकना ही थी तो पाकिस्तान पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए था । इसी तरह सउदी अरब ,मिस्र ,लेबनान , अफगानिस्तान को भी प्रतिबंध के दायरे में लाया जाना चाहिए था । तुर्की एक ऐसा देश है जहाँ पिछले कुछ समय में आतंकवादी घटनाओं वृद्धी हुई है । बीते दिनों तुर्की पर आइएस की मदद करने का आरोप भी लगा था ।वाशिंगटन पोस्ट ने स्पष्ट तौर पर राष्ट्रपति पर आरोप लगाया था कि तुर्की और मिस्र जैसे देशों पर प्रतिबंध न लगाने का कारण कहीं न कहीं उनके अपने व्पारिक हित हैं ।  दरअसल ये निर्णय अमेरिका की अंतराष्ट्रीय नीतिओं पर ही आधारित है जो अभी तक उतने खुले रूप में नहीं थी । इसका कारण ये है कि अभी तक किसी भी राष्ट्रपति ने देश की अँदरुनी राजनीति के लिए अंतराष्ट्रीय नीतियों की इस स्तर पर प्रयोग नहीं किया था । ट्रंप अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस मृद्दे को लेकर खासे आक्रामक नजर आए थे और अमेरिकी नागरिकों को इस चुनाव प्रचार से खासा रिझाया था । ये निर्णय कहीं न कहीं अमेरिकी जनता को प्रभावित करने और खुद को चुनावी वादे पूरा करने वाले नेता के तौर पर खुद को प्रदर्शित होता है बजाय आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई के । 

ब्रेक्सिट के बाद ये दूसरी ऐसी घटना है जो अंतराष्ट्रीय सहयोग की भावना पर सीधे तौर पर चोट करती है ।

(Shashank Trivedi is a student of Hindi Journalism. The views expressed are personal. He can be reached at s.shashanktrivedi@gmail.com. Follow him on Twitter @sshashanktrive1 )

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