प्रतिबन्ध: वास्तविक समाधान या सिर्फ प्रदर्शन

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shashank trivedi Sun, 08/28/2016 - 07:49 Bihar Liquor Ban, Uttar Pradesh Polythene Ban

प्रतिबंधों का  हमारे भी देश में  एक संसार बन चूका है ये प्रतिबन्ध प्रायः किसी भी सामाजिक समस्या को हल करने का वादा करते हैं। ये  प्रतिबन्ध सरकारों के अनुसार किसी भी समस्या के लिए हैरी पॉटर की जादुई छड़ी की तरह होते हैं।    
 
 बिहार में शराब पर प्रतिबन्ध के  बाद उत्तर प्रदेश अवं अन्य कई राज्यों में भी शराब पर प्रतिबन्ध  की मांग लगातार उठ रही  है और ये मांग इस लिए भी उठ रही है क्योंकि शराब वाकई एक हानिकारक पदार्थ है जो समाज में कई तरह के अपराधों के साथ साथ न जाने कितने लोगों की असमय मृत्यु के लिए भी जिम्मेदार है। 
 
शराब जैसी बुराइयों  पर प्रतिबन्ध की मांग समाज के अधिकतर संभ्रांत लोग एवं महिलायें करते हैं क्योंकि जनता को सीधी नज़र में प्रतिबन्ध ही ऐसी समस्यों को  खत्म करने का रास्ता नज़र आता है लेकिन एक  सरकार के पास जिस तरीके के संसाधन होतें हैं  ,एक पूरा तंत्र होता है ,उस सरकार को प्रतिबन्ध जैसे आसान उपायों की तरफ नहीं जाना चाहिए जिनसे आप किसी समस्या को सिर्फ कुछ समय के लिए रोक सकते हो।  
अगर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में प्रतिबंधों की बात की जाये तो यहाँ तो यहाँ न जाने कितने प्रतिबन्ध  लागु करने के  आदेश दिए जा चुके हैं लेकिन अगर उन आदेशों के पालन बात की जाये तो वो प्रतिबन्ध कहीं भी दिखाई नहीं देते।  
अगर हम शराब से जुड़े हुए प्रतिबन्ध की बात ही करें तो उत्तर प्रदेश में कच्ची शराब को बनाने एवं पीने दोनों पर प्रतिबन्ध है  परन्तु पिछले कुछ समय में  ही हम देखें  तो लगातर उत्तर प्रदेश में कच्ची शराब पीने से लोग मर रहें हैं  आखिर ये शराब प्रतिबन्ध के बावजूद क्यों बिकती है इसको जानें का प्रयास या तो  सरकार करना नहीं चाहती अथवा जानने के बावजूद अंजान बनने का प्रयास करती है।  
यदि आप उत्तर प्रदेश में कच्ची शराब के विक्रताओं की तरफ नज़र डालेंगे तो ये कोई विजय माल्या जैसे कोई उद्योपति नहीं हैं बल्कि समाज की मुख्य धारा से बिल्कुल अलग रहने वाले लोग हैं  , अधिकतर कच्ची शराब बेचने  वाले लोग एक खास जनजाति 
 से सम्बंधित होते हैं ,प्रायः इनके घर आज के समय में भी अनिश्चित होतें हैं , सरकार के पास इन्हें  मुख्य धारा में लानें की कोई योजना नहीं होती है।  समाज की मुख्य धारा से  अलग रहने वाले इन लोगों का मुख्य व्यवसाय ही कच्ची शराब का निर्माण कर बेचना होता है जिसके द्वारा इन्हें कम मेहनत में ज्यादा धन प्राप्त होता है।  सरकार  की नज़र इनकी भठ्ठियों पर तब पड़ती है जब  उससे बनने वाली शराब से एक साथ ज्यादा लोगों की म्रत्यु हो जाती है उस वक़्त प्रदेश में कच्ची शराब पर कोई प्रतिबन्ध है ऐसा  प्रदर्शित  हो जाता है.

सरकार का आबकारी विभाग  प्रदेश में छापे मारता है लेकिन इस डर से की कहीं समाज में अन्य अपराधों का स्तर कहीं बढ़ न जाये इसलिए जल्द ही इन्हें छोड़ दिया जाता है।  
इस पूरे प्रकरण में सरकार की असफलता ये है की आज तक आखिर इस प्रजाति के अभी तक सामाजिक विकास के लिए कदम क्यों नहीं उठाये गए , इन्हें इस बात को समझने के लायक क्यों नहीं बनाया गया की गरीब होने पर अपराध करना ही आखिर विकल्प नहीं होता।  इसके साथ ही प्रदेश में कच्ची शराब के उपभोक्ताओं के बीच में कच्ची शराब से होने वाले प्रभावों को  लेकर कोई खास प्रचार भी नहीं किया जाता जिससे उनके बीच इस पदार्थ को लेकर कोई जागरूकता पैदा हो।  
ठीक इसी तरह उत्तर प्रदेश में तम्बाकू युक्त  गुटखा और पान  मसाला प्रतिबन्ध की स्थिति भी है यहां गुटखा  प्रतिबन्ध की घोषणा सपा सरकार द्वारा की गयी सम्भवतः प्रतिबन्ध के 3 अथवा 4 दिन बाद तक गुटखा की बिक्री बंद रही लेकिन  इसके बाद गुटखा लोगों के बीच एक नए रूप में आ गया जिसमें तम्बाकू अलग थी और पान मसाला अलग ,अब लोगों को थोड़ी मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है उन्हें इसे मिलाना पड़ता है।  
 अगर तकनीकी द्रष्टिकोण से देखा जाये तो तम्बाकू युक्त गुटखे और पान मसाले पर प्रतिबन्ध प्रदेश में पूरी तरह से लागु है, ठीक इसी तरह का हाल उत्तर प्रदेश में पॉलिथीन पर प्रतिबन्ध का भी हुआ है।  
हाल ही में बिहार में कई इस तरह की घटनायें हुयीं हैं जिनसे पता चलता है की वहाँ शराब अभी भी उपलब्द्ध है।  

प्रतिबन्धों  पर अगर आप नज़र डालेंगे तो पाएंगे की उन सभी बुराईओं पर जिन पर प्रतिबन्ध लगाया गया है वो समाज में पूरी तरह विकराल रूप में आज भी फैली हुयी हैं उसका कारण है की इन प्रतिबन्धों का उद्देश्य  किसी समस्या या बुराई को ख़त्म करना  लिए नहीं  बल्कि सिर्फ जनता के समक्ष सिर्फ दिखावा  करना  होता है।  

किसी प्रतिबन्ध की घोषणा जनता के समक्ष खुद को एक बड़े नेता के रूप में प्रस्तुत करना होता है और साथ ही जनता के किसी बुराई के प्रति तात्कालिक गुस्से को शांत करना होता है क्योकिं हम भारतीय भूलना जल्दी पसंद करते हैं।  
शराब या अन्य सामाजिक बुराईओं के पीछे सिर्फ इनकी समाज में उपलब्धता ही एक कारण नहीं है बल्कि इनके मूल में कई ऐसे सवाल जुड़े होतें हैं जिनका जवाब देना सरकारों के लिए आसान नहीं  होता ,लेकिन वाकई अगर उस मूल में जाना पसंद किया जाये तो शायद इन् समस्याओं के दीर्घकालिक हल हमें प्राप्त हो सकें।  

हमें  हमारे समाज को किसी गलत रास्ते पर जाने से सिर्फ रोकना नहीं है बल्कि इतना ज्यादा जागरूक बना देना है की लोग उस गलत रास्ते पर खुद ही जाना बंद कर दे। 

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