Power and Kejriwal

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shashank trivedi Mon, 06/27/2016 - 07:21 Delhi Government, AAP

अरविन्द केजरीवाल देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और उनकी छवि एक ऐसे नेता रही है जो भ्रष्टाचार से बिल्कुल  भी समझौता नहीं करेगा और दिल्ली को एक सुशासन वाली सरकार देगा लेकिन वो कहीं न कहीं एक वो  पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं की नरेंद्र मोदी उनकी सरकार को ठीक तरीके से काम नहीं करने देना चाहते ,ये वास्तविकता में उनका पूर्वाग्रह ही है अथवा कोई राजनैतिक रणनीती है ये विचारणीय है। वैसे तो अरविन्द केजरीवाल हमेशा से ही नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अंधविरोध में लगे रहते हैं लेकिन पिछले कुछ समय से उन्होंने इसे अपने जीवन का अभिन्न अंग सा बना लिया है ,ऐसा लगता है की 67 सीटें जीतने का बाद वो एक अजीब प्रकार के अहंकार से जूझने लगे हैं वो आरोप तो लगाते  हैं लेकिन उनके पास साबित करने के लिए कुछ नहीं होता ,आरोप लगते वक़्त उनकी आक्रामकता देखने वाली होती है।  जीतेन्द्र सिंह तोमर की डिग्री के मुद्दे पर जिस तरह से उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाए और सत्य को समझे बगैर अनर्गल प्रलाप किया वो उनके जैसे गंभीर और ईमानदार छवि के साथ राजनीती में आये व्यक्ति को शोभा नहीं देता।  
इसके बाद वो राजेंद्र कुमार के ऑफिस पर सीबीआई छापे के समय में भी काफी आक्रमक नज़र आये और उन्होंने डीडीसीए में घोटाले को लेकर अरुण जेटली पर आरोप लगाए और दावा किया की उनके पास पूरे  सबूत और फाइल थीं जो अरुण जेटली को आरोपी सिद्ध कर सकती थीं तो दूसरे तरफ वो एक जाँच दल के गठन की बात करने लगे ,सवाल उठता है की यदि सबूत थे तो नयी जाँच की क्या आवश्यकता है , इस मामले में अरुण जेटली  ने उनके ऊपर मानहानि का मुकदमा किया जिसका केस अदालत में चल रहा है , इससे पहले भी अरविन्द केजरीवाल मानहानि के एक मामले में नितिन गडकरी से माफ़ी मांग चुके हैं।  
लेकिन हाल के समय में उन्होंने नरेंद्र मोदी के अंधविरोध की सारी हदें पार कर कर दी हैं अब उन्हें लालू प्रसाद यादव  के साथ मंच पर बैठने में भी कोई  आपत्ति नहीं है ये सही की लालू प्रसाद हर व्यक्ति से गले मिलने का प्रयास करते हैं  और शिष्टाचार  के कारण  लोग ऐसा करने से  मना नहीं कर पाते और फिर उस व्यक्ति के लिए एक विवाद की स्थिति प्रकट हो जाती है लेकिन इस तरह के मंच पर जाने की जरूरत ही क्या है जहाँ आप की छवि के  बिलकुल विपरीत छवि का व्यक्ति बैठा हो।  
नरेंद्र मोदी की डिग्री का मामला उन्होंने पुरे उत्साह के साथ उठाया उनकी पार्टी के तेवरों को देखकर ऐसा लगा भी जरूर ही डिग्री के मामले में कोई गम्भीर तथ्य उनके पास है और कुछ साबित होगा , आजकल ट्विटर एक ऐसा स्थान बन गया है जहाँ बीजेपी और आप ने अपने साइबर सेल के जरिये पूरा नियंत्रण कर रख्खा है अब वहां आम जनता सिर्फ दर्शक की भूमिका में आ चुकी है ,सम्भवता लगभग 4 दिन आप के साइबर सेल ने "डिग्री दिखाओ मोदी जी" नाम का हैशटैग चलाया लेकिन पहले गुजरात यूनिवर्सिटी और फिर अमित शाह ने खुद एक प्रेस कांफ्रेंस में मोदी जी की डिग्री दिखाई जिसके बाद इस विवाद को समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन इसके बाद भी आप की तरफ से ऐसे तथ्यों के आधार पर डिग्री को फ़र्ज़ी बताया गया की जिन्हे अगर गम्भीरता से लिया जाये तो देश के न जाने कितने लोगों की डिग्री फ़र्ज़ी साबित हो जाएगी, कहीं न कहीं पार्टी को लगा की अब ये मुद्दा उसके लिए ठीक नहीं रहा तो धीरे धीरे उस मुद्दे को खुद ही शांत कर दिया गया।  
जिस तरह से हमारे देश में नेताओं की अपारदर्शी छवि है उसका फायदा अरविन्द केजरीवाल पूरी तरह उठातें हैं नेताओं की भ्रष्ट  और अदालतों से सबूतों के आधार पर रिहा होने की उससे जनता में सामाजिक संदेश जाता है की नेता भ्रष्ट  तो है ही भले ही अदालत से सजा न मिली हो , अरविन्द केजरीवाल इसका पूरा फायदा उठाते हैं वो आरोप लगा कर नेताओं को सामाजिक बदनामी की तरफ धकेल देतें हैं।  , जनता को लगता है की जरूर मोदी जी की डिग्री में कुछ तो बात होगी ही।  ये एक बड़ा आसान तरीका है जिसे केजरीवाल और उनकी पार्टी ने अपना रखा है।  
हाल के समय में जब से अरविन्द केजरीवाल को अपने 21 विधायकों के अयोग्य घोषित होने का डर सता रहा है तबसे वो हर समय ट्वीटर के जरिए भद्र और अभद्र किसी भी भाषा में नरेंद्र मोदी पर हमला करते हैं। 
पहले उन्होंने प्रक्रिया का पालन न करते हुए संसदीय सचिवों की नियुक्ति की और फिर इससे संवैधानिक बंनाने का प्रयास किया और जब इसमें असफलता हाँथ लगी तो उहोंने इसका दोष भी प्रधानमंत्री को देना शुरू किया ,  उनका कहना है की अन्य राज्यों में भी ऐसा है और बीजेपी और कांग्रेस ने भी संसदीय सचिव बनाए हैं लेकिन सवाल इस बात का है की अगर आप भी बीजेपी और कांग्रेस की तरह का व्यवहार करेंगे तो आपको मुख्यमंत्री बनाने का जनता को क्या लाभ मिला दूसरे उन पार्टियों ने भी संसदीय सचिव बनने की प्रक्रिया का उचित पालन किया है।  उन्होंने एक फिल्म 'उड़ता पंजाब ' को भी राजनीती में खींचा और इसकी सेंसरशिप के मुद्दे को भी नरेंद्र मोदी से जोड़ने का प्रयास किया ,जैसे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष नरेंद्र मोदी हों ,उनके इस व्यव्हार को देखकर फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप ने भी अपील की कि उनकी लड़ाई को राजनैतिक न बनाया जाये और वो सेंसरशिप के लिए लड़ रहे हैं लेकिन केजरीवाल ने इसे राजनैतिक बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी।  
इसके बाद तो NSG में भारत को प्रवेश न मिल पाने पे जो उन्होंने प्रदर्शन किया है वो सम्भवता उनके आज तक सारे  विरोधो में सबसे निचले स्तर का है उनका कहना है की नरेंद्र मोदी ने देश को NSG के मुद्दे पे गुमराह किया है औरउनकी  यात्राएं सिवाय जनता के पैसे की बर्बादी के कुछ नहीं है ,जबकि  तथ्य यह है की नरेंद्र मोदी ने NSG में प्रवेश पाने का सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया और केवल चीन के विरोध के कारण  ऐसा संभव नहीं हो सका। जबकि केजरीवाल ने यहाँ भी नरेंद्र मोदी को एक गलत छवि के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया। यदि अरविन्द केजरीवाल के राजनीती में प्रवेश को देखें तो उस समय वो दिखने में दुबले पतले , आम आदमी के सामान साधरण से वस्त्र पहनने वाले और अन्ना हज़ारे के एक बेहद ही ईमानदार सहयोगी के रूप में थे।  उस समय भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार एक बहुत बड़ा मुद्दा बन चूका था और इसके कारण भी अन्ना हज़ारे और उनके सहयोगी थे इस तरह से वो जब राजनीती में आये तो बिलकुल एक आम आदमी की तरह थे जिससे लोगों ने बहुत सारी उम्मीदें थी। लेकिन अब जब की अरविन्द केजरीवाल पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में हैं और साथ ही अन्य राज्यों में भी विस्तार की तरफ देख रहे  हैं तो कहीं न कहीं उनका उद्देश्य भ्रष्टाचार  के विरूद्ध लड़ाई कम बल्कि सत्ता प्राप्त करना ज्यादा लग रहा है।  कुछ लोग हैं जो ये सोचते हैं की अरविन्द केजरीवाल  भी अन्य राजनेताओ. के सामान आर्थिक फायदों के लिए सत्ता का इस्तेमाल करेंगे और खुद और अपने साथियों की आर्थिक महत्वाकांक्षाअों  को पूरा करंगे लेकिन सम्भवता केजरीवाल उस आम आदमी की तरह हैं जिसका सपना  सत्ता और उस सत्ता की शक्तियों को प्राप्त करना होता है ये उनके उभार का समय है और वो ऐसे मे वो आर्थिक महत्वाकांक्षाअों को पूरा नहीं करेंगे क्योकि ये उनकी छवि और भविष्य को खत्म करके रख देगा बल्कि वो एक दूसरे प्रकार की राजनीती  करेंगे जिसमे  वो अपनी ईमानदार छवि का फायदा उठाकर किसी भी राजनेता के विरुद्ध जनता को भड़काने का प्रयास करेंगे, सत्ता और उसकी भूख ने शायद केजरीवाल को बदल कर रख दिया है. अन्ना आंदोलन और उसके बाद आम आदमी पार्टी के गठन ने देश को भ्र्ष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई के लिए एक उम्मीद दी थी , लोगों को भरोसा दिलाया था की भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी लड़ा जा सकता है , वो उम्मीद अब खत्म हो चुकी है बस अब लोगो के पास एक और राजनीतिक दल है अन्य दलों के समान ही आरोप लगाने ,में विश्वास रखता है न की उन आरोपों को अंजाम तक पहुँचाने का।  

(Shashank Trivedi is a freelance journalist and political analyst. The views expressed are personal. He can be reached at s.shashanktrivedi@gmail.com)

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