लोकसभा चुनाव के इस सफर में आज हम आपको लेकर चलते हैं पश्चिम बंगाल के अमेठी कही जाने वाली मालदा लोकसभा सीट पर. ये लोकसभा सीट 2009 तक एक ही थी लेकिन नए परिसीमन में बदलाव के चलते अब मालदा उत्तर और मालदा दक्षिण में ये बंट चुकी हैं. इन दोनों सीटों पर कांग्रेस का लगातार दबदबा रहा है और यही वजह कि इसे बंगाल के मालदा के नाम से जाना जाता है. हालांकि इस चुनाव में परिवार में फूट पड़ चुकी है भाई-बहन ही एक दूसरे को हराने के लिए मैदान में हैं.

मालदा की इस सीट पर देश के पहले चुनाव से ही कांग्रेस का दबदबा रहा है. 1971 और 1977 के चुनाव में माकपा की जीत को अगर छोड़ दें तो यहां लगातार कांग्रेस ने जीत दर्ज की. 1980 से लेकर 2004 तक कांग्रेस के एबीए घनी खान चौधरी इस सीट पर लगातार 8 बार सांसद रहे. ऐसे में ये सीट चौधरी परिवार के नाम पर रजिस्टर सी हो गई. 2005 में उनके निधन के बाद उनके भाई चौधरी हसेम खान यहां से सांसद बने. 2009 में मालदा उत्तर और दक्षिण सीट अलग होने के बाद हासेम खान दक्षिण मालदा से चुनाव लड़ने चले गए.उत्तर मालदा से उनकी भांजी मौसम नूर मैदान में उतरीं और संसद पहुंचने में कामयाब रहीं.

2014 के चुनाव में बंगाल में ममता बनर्जी की लहर थी इसके बावजूद भी कांग्रेस का कब्जा इन दोनों सीटों पर बरकरार रहा. हालांकि इस बार हालात थोड़े बदले हैं. यहां मौसम नूर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो चुकी हैं. दरअसल ममता बनर्जी मालदा की इन सीटों को इस बार फतह करने के लिए पूरा जोर लगा रही हैं. कांग्रेस ने चौधरी परिवार के ही एक नेता पर भरोसा किया है. उन्होंने यहां से हासेम खान के बेटे और मौसम के ममेरे भाई ईशा खान चौधरी को मैदान में उतारा है. बीजेपी भी इस बार इस सीट पर पूरा जोर लगा रही है. उन्होंने सीपीएम के 2014 के उम्मीदवार खागेम मुर्मू को मैदान में उतारा है. मूर्मू बीते चुनाव में मौसम नूर से 65 हजार वोटों से हारे थे. मौसम को जहां 33 फीसदी वोट मिले थे वहीं मुर्मू को 28 फीसदी वोट मिले थे. मालदा उत्तर की सात विधानसभा में 4 पर मुस्लिमों की आबादी 70 फीसदी है. ऐसे में ये वोट वहां अहम भूमिका अदा करेंगे. परिवार के बीच जंग में बीजेपी यहां कितना फायदा उठा पाती है ये देखने वाली बात होगी.

अब मालदा की दक्षिण सीट के बारे में बात करते हैं. इस सीट पर मौसम नूर के मामा हासेम खान दो बार से सांसद हैं. उन्होंने 2014 के चुनाव में यहां बीजेपी के विष्णुपाडा रॉय को 1 लाख से ज्यादा वोटों से शिकस्त दी थी. इस बार भी वो कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं. उनके खिलाफ तृणमूल कांग्रेस के मोअज्जम हुसैन ताल ठोक रहे हैं. बीजेपी ने यहां 2014 के तृणमूल उम्मीदवार रहे श्रीरूपा मित्रा पर भरोसा जताया है.

बांग्लादेश की सीमा से लगी इन दोनों लोकसभा सीटों पर गौ तस्करी, नकली नोटों का जोर शोर से होता है. चुनाव के बाद से यहां 19 लाख के नकली नोट पकड़े जा चुके हैं. बीजेपी य़हां खुद के लिए काफी उम्मीदें देखती है. बीते पंचायत चुनाव में हिंसा के दौर में बीजेपी ने यहां 532 सीटें जीतीं और वों दूसरे स्थान पर रही. तृणमूल कांग्रेस ने यहां से 1100 से ज्यादा सीटें जीतीं थीं लेकिन बीजेपी की सीट की संख्या में इजाफा हुआ है.

मालदा उत्तर में ममता बनर्जी, राहुल गांधी, अमित शाह तीनों ने रैलियां की हैं. 23 अप्रैल को दोनों सीटों पर मतदान हो चुका है. मालदा उत्तर में 2014 के मुकाबले 4 फीसदी कम यानि 76 फीसदी मतदान हुआ है. मालदा दक्षिण में भी 2014 के मुकाबले 2 फीसदी कम यानि 78 फीसदी मतदान हुआ है. 23 मई को ये जानना रोचक होगा कि मालदा की इन दो सीटों पर कांग्रेस का गढ़ टूटेगा या फिर चौधरी परिवार के सहारे वो इसे बचाने में कामयाब रहेगी.