लोहिया ने कहा था 'जिंदा कौमें बदलाव के लिए 5 साल इंतजार नहीं करती वह किसी भी सरकार के गलत फैसले का फौरन विरोध करती है'. बिहारियों को तो मुर्दों की जमात भी नहीं कहा जा सकता, ये बदलाव तो चाहते हैं लेकिन दूसरे के घर में.

पता नहीं किस ने तमगा दे दिया कि यहां राजनीतिक रूप से जागरूक लोग रहते हैं. जब तुम्हारे अपने सैकड़ों मासूम बच्चे चमकी बुखार से मर रहे हों, तुम्हारे अपने लोग लू से जान गंवा रहें हो, बाढ़ से तुम मरते हो, कुपोषण सबसे ज्यादा तुम्हारे यहां है और फिर भी तुम सड़कों पर उतरने की जगह ट्रंप और किम जोंग की पॉलिटिक्स पर डिस्कस कर रहे हो तो काहे का राजनीतिक जागरूकता बे.

जागरूकता क्या होती है हांगकांग से सीखो, जहां एक गलत फैसले के विरोध में देश की आधी आबादी सड़कों पर आ गई, कैरी लैम को फैसला बदलना पड़ा, माफी भी मांगनी पड़ी. तुमसे तो ये उम्मीद भी बेमानी है कि तुम सड़कों पर आओगे.

15 साल तुम्हारे यहां से रेल मंत्री रहे और ट्रेन के बाथरूम में खड़े होकर तुम ही यात्रा करते हो. देश के अलग-अलग हिस्सों में जलील तुम होते हो और देश के मुद्दों की सबसे ज्यादा चिंता तुम्हें ही रहती है. मुंबई, गुजरात, पंजाब, असम से तुम भगाए गए लेकिन कभी शिकायत नहीं की, कभी विद्रोह नहीं किया तो भुगतना भी तुम्हें ही पड़ेगा न.

मरने वाला बच्चा अकेले यादव का नहीं है, मुसलमान नहीं है, महादलित वर्ग से नहीं आता, बाबुसाहेब और पंडी जी के बेटे नहीं मर रहे. एक बिहारी होने के नाते तुम मर रहे हो क्योंकि तुमने आंदोलित होना बंद कर दिया. तुम बंटे हुए हो, इसलिए चुप हो. वर्ना इतने बड़े नरसंहार पर तुम्हारा खून उबल जाता, गांधी मैदान यूँही वीरान नहीं पड़ा होता बल्कि वहां इकट्ठे होकर तुम सत्ता से हिसाब मांग रहे होते.

कैसे दोष दे दूं किसी अश्विनी चौबे को, मंगल पांडे को या मुख्यमंत्री आवास में बैठकर जायजा ले रहे किसी नीतीश कुमार को. ये वही अश्विनी चौबे हैं जिनके अपने बक्सर में एक ढंग का अस्पताल नहीं है, ये वही मंगल पांडे हैं जिन्हें सरकार में दायित्व संभालने से ज्यादा पार्टी का विस्तार करने में मजा आता है.

दोषी ये नहीं हैं, दोषी हर एक बिहार वासी है जिसने इन लोगों से कभी हिसाब नहीं मांगा. वो बंटा रहा और ये बांटते रहे. कभी यादव-मुसलमान को किसी ने अपना जागीर समझा, किसी को उच्च जाति वोटर अपना वोटबैंक लगा और ये बारी-बारी से सत्ता की मलाई खाते रहे लेकिन एक बिहार का 'जागरूक' नागरिक होने के नाते तुमने कभी नहीं पूछा कि हेल्थ पर कितना खर्च हो रहा है, क्वालिटी एजुकेशन कहां है, पलायन रोकने के लिए क्या प्लान है. तुमने बस एक ही चीज देखी और वो ये कि किस नेता की जाति क्या है.

जो बच्चे इस दुनिया को छोड़ गए वो बेहद बदनसीब बच्चे थे, कहीं और पैदा हुए होते तो आज हँस-खेल रहे होते लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने वहां जन्म लिया जहां की हालत सूडान से भी बदतर है. जहां के लोग अपने घर को जला कर हाथ सेंकते हैं. जहां के लोग बहुत कोम्प्रोमाईज़ करते हैं. खुद पर हजार जुल्म सह लेते हैं लेकिन उफ्फ तक नहीं करते.

(ये लेख विवेक सिंह के फेसबुक पेज से लिया गया है, विवेक ZEE Media Corporation में पत्रकार है।)