दिल्ली विधानसभा चुनाव का एलान हो चुका है. 6 फरवरी को दिल्ली में वोटिंग होगी और 8 फरवरी को चुनाव नतीजों का एलान होगा. हर चुनाव से पहले कयास, भविष्यवाणियां की जाती हैं कि कौन सी पार्टी चुनाव में आगे रहने वाली है. दिल्ली चुनाव को लेकर भी भविष्यवाणियां हो रही हैं. बीजेपी और कांग्रेस के कट्टर समर्थकों को छोड़ दें तो लगभग सभी आम आदमी पार्टी की जीत की बात कह रहे हैं. आखिर केजरीवाल की पार्टी के बारे में ऐसी भविष्यवाणियां कैसे हो रही हैं ? जो पार्टी कुछ ही महीने पहले बुरी तरह लोकसभा चुनाव हारी हो वो भला ऐसे कैसे जीत सकती है. आज हम आपको बताने वाले हैं वो तीन बड़े कारण जिनकी वजह से AAP दिल्ली में भारी नजर आ रही है.

1. सीएम पद का बड़ा चेहरा होना-

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सीएम हैं और आप का चेहरा भी. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज अरविंद केजरीवाल की छवि एक प्रशासक की बन चुकी है. उनके भी तमाम चाहने वाले और विरोधी हैं. केंद्र सरकार के खिलाफ वो ही लगातार हल्ला बोल भी करते रहे हैं. बीते दिनों में उनकी पार्टी ने अपने कई पुराने वादे पूरे किए. वो मजबूत नेता नजर आते हैं. उन्होंने खुद को नरेंद्र मोदी के बराबर खड़ा करने की कोशिश की. वो अलग बात है कि अपनी इस कोशिश में बुरी तरह नाकाम रहे लेकिन दिल्ली जैसे राज्य के बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं से बहुत आगे निकल गए. कोई उन्हें कितना भी ड्रामेबाज क्यों न कह ले लेकिन उन पर भ्रष्टाचारी होने का आरोप नहीं लगा सकता. बाकी दोनों पार्टियां इन आरोपों से जूझती रही हैं. अरविंद केजरीवाल के सामने दिल्ली में बीजेपी की तरफ से मनोज तिवारी और हर्षवर्धन जैसे नेता हैं वहीं कांग्रेस से अजय माकन का नाम सामने आता रहा है. मनोज तिवारी भले ही सांसद हों और प्रदेश अध्यक्ष हों लेकिन उनकी पुरानी छवि पीछा नहीं छोड़ती. आज भी उन्हें उनकी पृष्ठभूमि की वजह से उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता. सांसद के तौर पर भी उन्होंने कुछ ऐसा किया भी नहीं है जिसकी कोई विशेष चर्चा हो. शायद यही वजह है कि बीजेपी ने उन्हें अपना सीएम उम्मीदवार तक घोषित नहीं किया है. इसलिए प्रशासनिक तौर पर वो केजरीवाल से बहुत पीछे हैं.

हर्षवर्धन की बात करें तो उनकी छवि भी ईमानदार नेता की है. लेकिन वो सौम्य स्वभाव के माने जाते हैं. केजरीवाल उनके मुकाबले कहीं ज्यादा आक्रामक नजर आते हैं. केजरीवाल एक मास लीडर हैं जिनकी बातों को जनता सुनती है वहीं हर्षवर्धन कम बोलने वाले और एक दायरे में रहने वाले नेता हैं. केजरीवाल जैसी शख्सियत से टक्कर लेने के लिए उतनी ही आक्रामकता और रणनीति की जरूरत है, जिसमें हर्षवर्धन कमजोर नजर आते हैं. कांग्रेस के अजय माकन भी हर्षवर्धन वाली छवि के ही नेता हैं. उनके सामने अपनी पार्टी में ही चुनौतियां रही हैं और केजरीवाल के सामने वो भी कहीं खड़े नहीं नजर आते.

चेहरे के अभाव में बाकी दोनों पार्टियों का आक्रमण कमजोर है. बीजेपी भले ही मोदी नाम से नैया पार लगाने की कोशिश करे लेकिन दिल्ली के लोकल मुद्दों के आगे जनता शायद ही केजरीवाल के आगे मोदी जी का नाम पसंद करे. ऐसे में AAP बीजेपी और कांग्रेस से आगे नजर आती है.

2. स्थानीय मुद्दों पर जनता को खुश करना-

पिछले विधानसभा चुनाव में AAP ने 70 में से 67 सीटें जीतीं. पार्टी का आत्मविश्वास चरम पर था. ऐसे में अरविंद केजरीवाल पीएम मोदी पर हमलावर हो गए. उन्होंने एलजी नजीब जंग और पीएम को जमकर कोसा. एक बार तो उन्होंने पीएम को मनोरोगी तक कह दिया. इसी बीच 5 साल का वक्त आगे बढ़ता गया और केजरीवाल को झटके लगने शुरु हो गए. दिल्ली एमसीडी के चुनाव में पार्टी तीसरे नंबर पर रही. पंजाब में विधानसभा चुनाव बुरी तरह हारी. गोवा से भी पार्टी को उम्मीद थी लेकिन वहां भी पार्टी हार गई. केजरीवाल ने इन गलतियों से सीखा. अपनी रणनीति बदली. पीएम मोदी पर हमले कम किए. हालांकि तब तक देर हो चुकी थी और लोकसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. पार्टी 7 में से कोई भी सीट नहीं जीत सकी. लेकिन लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनाव तक का वक्त आप के लिए वरदान साबित हुआ. महिलाओं के लिए बस में फ्री यात्रा से लेकर सीसीटीवी तक के कई वादे केजरीवाल ने इस दौरान पूरे किए. मोहल्ला क्लीनिक और बेहतर स्कूल पर सरकार पहले ही काम कर रही थी. फ्री बिजली और पानी देना भी आप के पक्ष में गया. लिहाजा AAP ने यह चुनाव अपने काम के आधार पर लड़ने का निश्चय किया. पार्टी जानती थी कि बगैर काम दिखाए मोदी के सामने AAP टिक नहीं पाएगी और अब पार्टी अपने काम के आधार पर चुनाव लड़ने की बात कह रही है. इन स्थानीय मुद्दों पर जनता को अपने पक्ष में करना बीजेपी और कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा. ऐसे में यहां भी AAP आगे नजर आती है.

3. दिल्ली में ध्रुवीकरण-

दिल्ली में करीब 12 फीसदी मुस्लिम आबादी है. प्रदेश की 70 में से 10 सीटों को मुस्लिम बहुल माना जाता है. बल्लीमारान, चांदनी चौक, मटिया महल, बाबरपुर, मुस्तफाबाद, सीलमपुर, ओखला, त्रिलोकपुरी जैसी सीटें मुस्लिम बहुल हैं. CAA और NRC के खिलाफ पूरे देश में मुस्लिमों का गुस्सा बीजेपी के खिलाफ है. दिल्ली भी CAA के खिलाफ भड़की हिंसा का शिकार रहा है. ऐसे में यहां ध्रुवीकरण होने के पूरे आसार दिख रहे हैं. दिल्ली में आमतौर पर लोग केजरीवाल के साथ दिख रहे हैं. मुस्लिमों को लेकर आम धारणा भी रही है कि वो उस पार्टी का समर्थन करते हैं जो बीजेपी के खिलाफ मजबूत दिखती है. दिल्ली में फिलहाल कांग्रेस इस हालत में है नहीं ऐसे में मुस्लिम वोटरों का प्यार आम आदमी पार्टी को मिलने की उम्मीद दिख रही है. 2014, 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी में भी ध्रुवीकरण हुआ, लेकिन वो ध्रुवीकरण दोनों पक्षों में हुआ. चूंकि बहुंसख्यक ज्यादा हैं इसलिए बीजेपी जीतने में कामयाब रही. दिल्ली में फिलहाल ऐसा होता नहीं नजर आ रहा. ऐसे में ध्रुवीकरण के मामले में भी आम आदमी पार्टी आगे नजर आ रही है.