आज सुबह कानपुर में उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ ने गैंगस्टर विकास दुबे को उज्जैन से लाते वक्त एक मुठभेड़ में मार दिया। कहानी वही पुरानी है की विकास दुबे जिस कार में था उसका एक्सीडेंट हो गया और गाड़ी पलट गयी। गाड़ी पलटने के बाद दुबे ने पुलिस की पिस्तौल छीन ली और भागते हुए पुलिस पर फायरिंग करने लगा। पुलिस की जवाबी कर्यवाही में 5 लाख का इनामी बदमाश विकास दुबे मारा गया उसे सीने और कमर में गोलियां लगी हुई थी।

कल उज्जैन के महाकाल मंदिर में सरेंडर के बाद सभी यही सम्भावना व्यक्त कर रहे थे की उज्जैन से कानपुर के रस्ते में दुबे का एनकाउंटर हो जायेगा और वही हुआ। जबकि पुलिस के काफिले के साथ आज तक न्यूज़ चैनल की एक गाड़ी लगातार कवरेज के लिए चल रही थी। मुठभेड़ की जगह से ठीक पहले तलाशी के नाम पर आज तक की गाडी और बाकी ट्रैफिक को रोक लिया गया और ठीक 10 मिनट बाद ये खबर आ गयी की विकास दुबे को मुठभेड़ में गोली मार दी गयी है।

बहुत बड़ा वर्ग है जो उत्तर प्रदेश पुलिस के इस कारनामे की वाहवाही करने में लगे है। योगी और विकास दुबे के मीम सोशल मीडिया में छाए हुए है। कुछ राजनीतिक विरोधी वर्ग ऐसा भी है जो हर कार्यवाही पर सिर्फ नकारात्मक सवाल ही उठा रहे है। ज्यादातर एक खास संप्रदाय के लोगों का जोर इस बात पर था की कैसे विकास दुबे को आतंकवादी लिखा जाए एक अपराधी नहीं। कल तक जो लोग विकास दुबे का नाम लेकर कफील खान की आजादी मांग रहे थे क्या जिस तरह से दुबे का एनकाउंटर किया गया है उसी तरह के एनकाउंटर की मांग कफील खान के लिए अब करेंगे।

विकास दुबे का पुलिस के इस तथाकथित मुठभेड़ में मारा जाना न सिर्फ पुलिस, राजनेताओं और आला अधिकारियों के बदमाशों से गठबंधन पर पर्दा डाल देगा बल्कि ये खुलेआम देश के कानून व्यवस्था पर ऐसी चोट है जो सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था को चुनौती देती है। इस घटना से पहले से ही भ्रष्टाचार में लिप्त पुलिस को अब ये खुलेआम प्रोत्साहन मिल गया है की वो जिसे चाहें, जब चाहें एक फर्जी कहानी बना कर मुठभेड़ में मार देंगे।

किसी अपराधी का इस तरह से मुठभेड़ में मारा जाना तो आप उचित बता कर पुलिस और शासन सत्ता का जयकारा कर सकते है पर सोचिये कभी किसी आप के अपने को जो बेक़सूर हो उसे आप का विरोधी पुलिस को पैसे देकर ऐसी मुठभेड़ में मरवा दे तो आप किसके पास जायेंगे अपनी शिकायत लेकर।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है साल 2018 के सितम्बर महीने के आखिर में इसी उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के पॉश इलाके में एप्पल मोबाइल के एक्सक्यूटिव विवेक तिवारी को पुलिस ने गुडवर्क दिखाने के लिए गोली मार कर हत्या कर दी थी। बाद में योगी सरकार ने विवेक तिवारी की पत्नी को मुआवजा और सरकारी नौकरी दे दी। सवाल यह है की कैसे एक पुलिस के एक सिपाही की इतनी हिम्मत हो जाती है की रात में गश्त पर निकलने के दौरान सड़क किनारे खड़ी गाड़ी में बैठे व्यक्ति को बिना किसी बात के वो सीधे गोली मार देता।

विकास दुबे के एनकाउंटर के अलावा इस केस में जिस तरह से पुलिस ने कार्यवाही की है वो न्याय व्यवस्था का सीधा सीधा मजाक उड़ाना है। पुलिस का काम अपराधी को उसके जुर्म के लिए पकड़ना है सजा देने के लिए अदालत की व्यवस्था है। अगर आप के अदालती व्यवस्था में खामी है तो उसे ठीक करने की जरूरत है न की पुलिस द्वारा ही दंड देने की व्यवस्था बना देने की। दुबे का घर, कार निजी सम्पति को ध्वस्त करना, अलग अलग साथियों को कहानी बता कर मुठभेड़ में मार देना, 12 साल के बच्चे और 10 पहली शादी कर के आयी महिला को गिरफ्तार कर लेना। और उसके बाद जनता के द्वारा इन सब को उचित ठहराते हुए सही करार देना एक अच्छे भविष्य की निशानी नहीं है।