अगर वर्तमान समय में आप भारत के विपक्ष की हालत देखना चाहते हैं तो नागरिकता संशोधन बिल पर लोकसभा की बहस देखिए. आपको अहसास हो जाएगा कि भारतीय राजनीति किस तरह से विपक्षहीन होती जा रही है. कैसे विपक्ष सिर्फ जन समर्थन ही नहीं बल्कि अपने तर्कों में भी बेहद कमजोर हो चुका है. मीडिया पर आरोप लगता है कि वो विपक्ष को जगह नहीं देता लेकिन असली बात ये है कि भारत का वर्तमान विपक्ष जगह देने लायक ही नहीं है. नागरिकता संशोधन बिल के जरिए आज हम भारत के निठल्ले हो चुके विपक्ष की एक तस्वीर आपके सामने पेश करने जा रहे हैं.

विपक्ष का इस समय सबसे बड़ा नेता राहुल गांधी को माना जाता है. कारण है कि वो एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख की हैसियत रखने वाले शख्स हैं. यह पार्टी भारत की सबसे पुरानी पार्टी है. अगर अभी देश में चुनाव होने लगें तो निश्चित तौर पर एक वर्ग उन्हें पीएम के तौर पेश करने लगेगा लेकिन भारत के इस कथित पीएम इन वेटिंग का हाल बहुत बुरा है. नागरिकता बिल पर चर्चा के दौरान यह महोदय सदन से गायब थे. इतने बड़े नेता होने के नाते उन्हें अपनी बात रखनी चाहिए थी लेकिन वो सदन में थे ही नहीं. जिस आदमी का फुलटाइम जॉब ही राजनीति हो, वो भला इतना लापरवाह कैसे हो सकता है. जब अमित शाह जी छाती ठोक ठोक कर एक दिन में तीसरी बार सदन में बोल रहे थे और अपना लगभग भाषण समाप्त कर चुके थे, तब राहुल गाँधी जी ने सदन में एंट्री ली. बिल के पक्ष में सदन में 311 वोट पड़े और विरोध में 80 वोट पड़े. शायद राहुल गांधी इन 80 लोगों में अपनी संख्या गिनवाने आए होंगे. जब बिल पास हो गया तो अगले दिन राहुल गांधी जी ने बिल के खिलाफ ट्विटर पर लिखा कि बिल भारत के संविधान के खिलाफ हैं. अगर राहुल गांधी जी ट्विटर को ही इतना अहमियत देते हैं शायद इन्हें ट्विटर पर ही रह जाना चाहिए. संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे देना चाहिए.

एक और युवा तुर्क हैं, अखिलेश यादव. यूपी के आजमगढ़ से सांसद हैं. महोदय चर्चा के दौरान सदन से गायब थे. ट्विटर पर यह भी खासे एक्टिव रहते हैं. विपक्ष की तरफ से जो नेता बोले भी उनका भाषण प्रभावशाली नहीं था. अधीर रंजन चौधरी, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, सुप्रिया सुले, शशि थरूर सभी ने बिल के भारतीय संविधान के खिलाफ होने का राग अलापा लेकिन भारतीयों पर बिल का असर पड़ेगा, इसके बारे में कुछ ठोस तर्क नहीं दिए. जब सामने अमित शाह जैसा वक्ता हो तब तर्क की कसौटी पर आपको मजबूत होना चाहिए. हालत यह है कि आज असदुद्दीन ओवैसी जब बोलने आते हैं तो उनको न्यूज चैनलों पर जगह मिलती है. वजह साफ है ओवैसी के अंदर वो आक्रामकता और तर्क शक्ति है जिसके जरिए अमित शाह को जवाब दिया जा सकता है. हमारी सालों पुरानी और सांसदों की लंबी लंबी संख्या वाली पार्टियों को ओवैसी से सीखने की जरूरत है. जहां महज 2-3 सांसद वाली पार्टी का नेता पूरे तेवर से अपनी बात रख रहा है, इन पार्टियों के नेता विरासत में मिली राजनीति को बर्बाद करने का काम कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर आरोप लगता है कि वो विपक्ष को डराने धमकाने और जेल भेजने का काम करते हैं लेकिन अपने कर्म भारत के विपक्ष नहीं देखता. जब जनता ने आपको चुनकर भेजा है तो संसद में जाने से या बोलने से मोदी और शाह आपको नहीं रोक सकते. अगर मोदी-शाह को हराना है तो आपको संसद और जनता के बीच दोनों जगह जाना पड़ेगा , लेकिन आप दोनों जगहों से नदारद हैं. राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं को समझना होगा कि ट्विटर पर बुद्धिजीवियों का रिट्वीट और समर्थन पाकर आपकी राजनीति आगे नहीं बढ़ने वाली. ट्विटर की दुनिया भारत के कथित बुद्धिवियों की समझ की तरह ही बहुत छोटी है, यहां से सिर्फ माहौल बनता है. चुनाव या विचारधारा की लड़ाई नहीं जीती जा सकती.