अमेरिका की एक जानी मानी पत्रिका 'द वीक' ने अपने एक लेख में लिखा है की भारतीय सेना ने पिछले कुछ समय में चीन के साथ चल रहे तनाव के बीच खेल के नियम अब बदल दिए है। अब भारतीय सेना चीन के मुकाबले ज्यादा आक्रामक दिखाई देती है। भारत ने आक्रामकता को ही सबसे अच्छे रक्षात्मक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

'द वीक' के अनुसार भारतीय सेना वास्तव में अब और भी ताकतवर और युद्ध के लिए तैयार दिखाई पड़ती है। भारतीय सेना की माउंटेन डिवीज़न को पहाड़ो की लड़ाई में दुनिया के सबसे बेहतरीन सेना माना जाता है। सियाचिन जैसे दुनिया के सबसे ऊँचे लड़ाई के मैदान में माइनस पचास डिग्री से कम तापमान पर भी जवान पूरे साल डटे रहते है।

पत्रिका के अनुसार हिमालय की इस लड़ाई में मुँह की खाने के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए ये एक बड़ी स्तर की घरेलु समस्या बन गयी है। शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और सेना दोनों के मुखिया है। ऐसे में सेना के अफसर शी जिनपिंग के प्रकोप से बचने के लिए सीमा पर कोई कार्रवाही भी कर सकते है।

'द वीक' के अनुसार भारत के साथ इस तनाव के सूत्रधार खुद चीनी राष्ट्रपति है। चीनी सेना की इस योजना को सहमति दे कर शी जिनपिंग ने अपने खुद के भविष्य को खतरे में डाल लिया है। जिस तरह से चीनी सेना लद्दाख में पस्त हो रही है उसके बाद शी जिनपिंग पर सवाल उठाना लाजमी है।

भारतीय सेना के आक्रामक रुख के बाद चीन के अगले कदम पर भारत को पैनी नजर रखने की जरूरत है। पत्रिका ने दावा किया है की गलवान घाटी में हुए संघर्ष में चीन के कम से कम 43 सैनिक मारे गए थे। वंही फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसिज नामक संस्था ने अपने लेख में दावा किया था की इस संघर्ष में कम से कम 60 चीनी सैनिक मारे गए थे। और इस टकराव के बाद ही चीन को ये समझ आ गया था की भारत इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अख्तियार कर सकता है।