बीते दिनों कोरोना के चलते पीएम मोदी ने देश में 21 दिनों के लॉकडाउन का ऐलान कर दिया. पीएम मोदी ने अपील की कि देश के लोग अगले 21 दिनों तक अपने घरों में ही रहें. उनके ऐलान के बाद देश के बड़े शहरों में काम करने वाले मजदूर वर्ग को भारी संख्या में अपने घरों की ओर पलायन के लिए जाते हुए देखा गया. हालत यहां तक है कि लोग पैदल ही अपने घर की ओर निकल पड़े हैं. ये लोग कई सौ किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करने को बेताब हैं. इनके साथ छोटे छोटे बच्चें हैं और जरूरत का सामान है और ये वापस अपने गांव की ओर चल दिए हैं.

दरअसल शहरों में काम करने वाले मजदूरों को अपना भविष्य संकट में नजर आ रहा है. फैक्ट्रियां बंद हैं ऐसे में इन लोगों को लगता है कि बगैर काम के शहर में गुजारा होना मुश्किल है और ये लोग गांवों की तरफ जा रहे हैं. शहरों में हाईवे पर बैग लेकर जाते ऐसे ही तमाम लोग नजर आ रहे हैं. एक भी गाड़ी देखते ही ये लोग उसके पीछे भागते हैं.
नोएडा सेक्टर 68 में रहने वाले हमारे साथी देव गुप्ता बताते हैं, "मेरे पड़ोस में छोटे छोटे मकानों में रहने वालों मजदूर वर्ग के तमाम लोग अपना ठिकाना छोड़कर जा चुके हैं. ये लोग अपने साथ बिस्तर और कुछ सामान बांधकर ले जाते दिखे. ऐसा लगता है कि पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़े हैं और रास्ते में जहां थकेंगे वहीं बिस्तर लगाकर सो जाएंगे."

दरअसल इन लोगों का डर जायज भी है. यूपी के हरदोई जिले के कुछ लोग उत्तराखंड के देहरादून में फंसे हैं. इन लोगों ने वीडियो जारी करके मदद मांगी है. इन लोगों का कहना है कि वो होली के बाद काम के लिए उत्तराखंड आए थे और थोड़े ही दिनों बाद लॉकडाउन हो गया. इन लोगों का काम बंद हो चुका है, पैसे इनके पास नहीं हैं और दूसरे शहर में इन लोगों को उधार भी देने को कोई तैयार नहीं. उत्तराखंड प्रशासन भी इनकी मदद नहीं कर रहा. ऐसे ही हरदोई का ही एक शख्स गुजरात के अहमदाबाद में फंसा हुआ है. कांच फैक्ट्री में चौकीदारी करने वाले क फैक्ट्री के केबिन में रात गुजारते थे. बाहर होटल में खाना खाते थे. अब कांच फैक्ट्री बंद हो चुकी है और लॉकडाउन के चलते होटल भी बंद हैं. खाने का सामान इनके पास खत्म हो चुका है औऱ अब ये अपने गांव वालों से फोन करके अहमदाबाद से निकालने की गुहार लगा रहे हैं.

आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझते लोग ऐसे दौर में लोग किसी भी कीमत पर घर जाने को तैयार हैं. ऐसे ही 15 लोगों की जानकारी हमें मिली. इन लोगों के पास सिर्फ पैसे और इनके कपड़े बचे थे. रेलवे के जनरल डिब्बों में सफर करने की आदत वाले इन लोगों ने दिल्ली से वापस अपने गांव आने के लिए मदद मांगी. गांव में बड़ी गाड़ी रखने वाले किसी शख्स ने सभी को वापस लाने के लिए 45 हजार रुपये की मांग की. तमाम मिन्नतों के बाद 22 हजार पर बात तय हुई और बड़ी कठिनाई से लगभग 500 किलोमीटर का सफर ये लोग तय करके वापस आ सके. इन लोगों के सामने दिल्ली में खाने और रहने का संकट था.

दिल्ली सरकार ने हालांकि तमाम हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं. तमाम जगह खाने की व्यवस्था की गई है लेकिन इन मजदूरों तक यह संदेश पहुंचाने वाले लोग नहीं हैं. शहरों में रहने वाले इन तमाम मजदूरों को अपना भविष्य बिल्कुल संकट में नजर आ रहा है और वो अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं. कोरोना के संकट के इस दौर में सरकारें बेशक प्रयास कर रही हैं लेकिन जरूरी है कि इन तमाम लोगों को भरोसे में लिया जाए क्योंकि इन तमाम लोगों में से अगर कोई भी कोरोना से संक्रमित हुआ और ये वायरस गांवों तक पहुंचा तो हालात बहुत बिगड़ सकते हैं. ऊपर जिन 15 लोगों के गांव वापस आने का जिक्र किया गया है, उनमें से एक का भी कोरोना टेस्ट नहीं हुआ है. इनसे प्रशासन ने ना तो संपर्क किया और ना ही इन लोगों ने खुद भी टेस्ट कराना जरूरी समझा.1994 में जब गुजरात के सूरत में प्लेग फैला तो लोग इसी तरह यूपी-बिहार में अपने गांवों की ओर भागने लगे जिससे गांवों में भी प्लेग फैल गया और बड़ी आबादी को अपनी जान गंवानी पड़ी. ऐसे में लोगों को भरोसे में लेना जरूरी है वर्ना लॉकडाउन के बाद भी तबाही हो सकती है.