पीएम मोदी ने बीती 25 मार्च को कोरोना के चलते पूरे देश में लॉकडाउन का ऐलान किया. पीएम ने लॉकडाउन का ऐलान 21 दिनों के लिए किया. लॉकडाउन का मकसद था देश के जो लोग जहां हैं, वहीं रूक जाएं ताकि कोरोना को फैलने से रोका जा सके. पीएम के ऐलान से पहले काफी ट्रेनें और बसें रद्द की जा चुकी थीं. पीएम के ऐलान के बाद पूरी तरह से इन सेवाओं पर रोक लगा दी गई. इसी बीच तमाम ऐसे लोग जिन्हें दिल्ली में रोजी रोटी का संकट दिख रहा था, सड़कों पर निकल पड़े. ये लोग अपने गांवों की ओर लौट रहे थे.

दिल्ली से अपने गांवों की ओर लौट रहे लोगों में सिर्फ रोटी-रोटी का ही डर नहीं है, इनमें से तमाम लोगों को लगता है कि घर ज्यादा सुरक्षित हैं. इनमें से तमाम लोगों को ये भी लगा कि लॉकडाउन 3 महीने तक चलेगा ऐसे में घर तक पहुंचना जरूरी है. ऐसे में ये लोग साधन ना होने पर पैदल ही घर की ओर चल दिए. इन लोगों की तस्वीरें पहले सोशल मीडिया पर आईं और उसके बाद टीवी पर भी इनकी न्यूज चलाई जाने लगी. दिल्ली और यूपी सरकार ऐसे में दबाव में आ गईं. दिल्ली सरकार ने यूपी बॉर्डर तक लोगों को डीटीसी बसों में छोड़ा और वहां से यूपी सरकार की बसें इन्हें ले जाने लगीं. लोगों में इस बात की जानकारी फैली और जो लोग घरों में थे वो भी गांव जाने के लिए निकल पड़े. ऐसे में दिल्ली के आनंद बिहार बस अड्डे पर लोगों की खासी भीड़ नजर आई. लोगों ने सवाल उठाया ऐसे तो लॉकडाउन फेल हो जाएगा.

वाकई लोगों के गांवों में इस तरीके से लौटने पर लॉकडाउन का काफी मकसद फेल हो गया. गांव वापस जाने वाले लोगों में अगर कुछ लोग भी संक्रमित हुए तो बड़ी तबाही हो सकती है. गांवों में ना तो कोरोना के टेस्ट के व्यवस्था और ना ही इलाज की, ऐसे में कोरोना अगर गांवों तक पहुंचा तो बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी. सवाल ये है कि इतने लोग गांव लौटने लगे और खतरा पता होने के बाद भी इन्हें रोका क्यों नहीं गया ?

लॉकडाउन के तुरंत बाद जब कुछ लोग पैदल जाने के लिए निकले थे तो उन्हें रोका जाना चाहिए था. उन्हें भरोसा दिलाया जाता कि दिल्ली में उन्हें किसी तरह की समस्या नहीं होने दी जाएगी. बजाय इसके सोशल मीडिया के भावुक वीरों ने इसे गरीब और अमीर के बीच की लड़ाई के तौर पर दिखा दिया. लोगों का कहना था कि जब विदेश से भारतीयों को लाने के लिए विमान भेजा जा सकता है तो भला यहां के लोगों को सुविधा क्यों नहीं दी जाती. इन लोगों को समझ आना चाहिए कि विदेश में भारतीय 'फंसे' क्यों कहे जाते हैं. दरअसल हर देश और उसके लोगों की प्राथमिकता उसके अपने लोग होते हैं. अगर किसी देश में हालत खराब होती है तो वो देश अपने नागरिकों को प्राथमिकता देगा बजाय किसी विदेशी के. ऐसे में विदेश से भारतीयों को लाना जरूरी होता है.

यूपी या बिहार का कोई मजदूर दिल्ली में है और उसे खाने या रहने की दिक्कत है तो उसकी तुलना विदेश में फंसे लोगों से नहीं की जा सकती क्योंकि दिल्ली भी हमारे ही देश में है और मजदूरों को बगैर यूपी-बिहार ले जाए बिना भी उनके खाने रहने का इंतजाम हो सकता है. लोगों के इन्हीं तर्कों के सामने सरकारें झुकीं और मजदूरों को उनके गांव ले जाया जाने लगा. ये राज्यों और केंद्र सरकार सभी की असफलता है और सोशल मीडिया के बुद्धिजीवियों को तो क्या ही कहा जाए, उनकी तो अलग ही जमात है. भगवान ना करे लेकिन अगर गांवों में ये बीमारी फैलने लगती है तो इसके लिए भी ये लोग सरकारों को जिम्मेदार ठहराएंगे.

जरूरी था कि हर तरह से प्रयास होता कि कोई भूखा ना सोए, हर किसी को एक छत का आसरा मिले लेकिन जो जहां है वहीं रहता लेकिन हमारी सरकारे तमाम प्रयासों के बावजूद ये करने में नाकामयाब रहीं. मोदी जी ने 25 मार्च को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा था कि अगर सावधानी ना रखी गई तो परिवार के परिवार तबाह हो सकते हैं, हम 21 साल पीछे जा सकते हैं. मोदी जी के लॉकडाउन की धज्जियां दिल्ली-यूपी में ही नहीं, तेलंगाना- आँध्र और केरल समेत कई राज्यों में उड़ी हैं. लॉकडाउन की ये हालत देखकर लगता है कि हम भूतकाल की यात्रा पर निकल पड़े हैं, प्रार्थना करिए भूतकाल की ये यात्रा 21 साल ना खिंचे.