डॉनल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से कश्मीर पर मध्यस्थता का राग अलापा है. उन्होंने कश्मीर के हालात को विस्फोटक बताया है. इस बार बस फर्क ये है कि उन्होंने इसमें पीएम मोदी या भारत को नहीं घसीटा है. पाकिस्तान लगातार कश्मीर मुद्दे को गर्म रखने की कोशिश कर रहा है. इमरान खान लगातार जहरीले ट्वीट भी कर रहे हैं और भारत की तरफ से भी जवाबी कार्रवाई जारी है. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सैय्यद अकबरुद्दीन जैसे लोग पाकिस्तान को ठंडा कर रहे हैं तो बॉर्डर पर जवान भी पाकिस्तानी सेना और आतंकियों का खून ठंडा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.

खैर हम वापस लौटते हैं डॉनल्ड ट्रंप पर. आज हम विश्व की महान शख्सियत के बारे में चर्चा करेंगे. बीते दिनों नेटफ्लिक्स पर वेब सीरीजी सेक्रेड गेम्स का दूसरा सीजन आया. पहले की तरह ये भी खासा चर्चा में रहा. वेब सीरीज का मुख्य किरदार गणेश गायतोंडे का किरदार ट्रंप से बहुत मिलता जुलता है. कभी वो दुनिया खत्म करने के मिशन का हेड बन जाता है तो कभी इसी मिशन को खत्म करने पर अड़ जाता है. डॉनल्ड ट्रंप भी इसी तरह अस्थिर हैं. वो किम जोंग उन की तारीफ करते हैं. मुलाकात करते हैं , दोस्ती की लंबी बातें करते हैं और फिर दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्याभ्यास भी शुरु कर देते हैं. लिहाजा तानाशाह मिसाइल टेस्ट कर देता है.

भारत से दोस्ती, कश्मीर मुद्दा हल करने की बैचेनी के बीच वो अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की तैयारी भी कर रहे हैं. जाहिर हैं वहां के हालात का फायदा पाकिस्तान उठाने वाला है. किम जोंग उन से उनकी मुलाकातें और कश्मीर मुद्दा हल करने की उनकी बैचेनी देखकर लगता है कि उन्हें शांति का नोबेल चाहिए. वैसे ये इतना मुश्किल भी नहीं, लीबिया और सीरिया को बर्बाद करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को पहले ही शांति का नोबेल मिल चुका था. ऐसे में ट्रंप के कदम अपने पूर्ववर्ती के समान नजर आते हैं. बस फर्क ये है कि ट्रंप बड़े अस्थिर और बैचेन प्राणी हैं. वो ज्यादा दिन तक छिपकर नहीं रह पाते. अपनी पोल पट्टी खुद ही खोल डालते हैं.

अपने देश में जब कोई इनकी फैलाई नफरत की वजह से ही गोली चलाकर लोगों को मार देता है तो ये दुख जता देते हैं लेकिन अगले ही दिन किसी ट्वीट या रैली में वही ऩफरत का जहर फिर से जाकर उड़ेल देते हैं. बराक ओबामा अमेरिका में बंदूकों की बिक्री के नियम को सख्त बनाना चाहते थे ताकि गोलीकांडों और अपराधों में कमी आ सके. अमेरिकी संसद से उन्हें इस बात की अनुमति नहीं मिली. वो एक बार रोने भी लगे. ओबामा के वक्त ही दरअसल गोलीकांडों की शुरुआत हुई थी. ट्रंप के वक्त में इनकी संख्या काफी बढ़ गई लेकिन ट्रंप साहब ने कोई कोशिश नहीं की. शायद उनकी राजनीति को अमेरिका का ये गनकल्चर शूट करता है.

इतने दिनों में ट्रंप साहब को दुनिया में सिर्फ ईरान ही एक स्थायी दुश्मन नजर आया. पहले साहब ने आते ही ईरान के साथ हुए शांति करार को तोड़ा और फिर उसके बाद तमाम सख्त प्रतिबंध लगाकर युद्ध तक के हालात बना दिए. शुक्र ये है कि ईरान में इन दिनों उदारवादी लोग सत्ता में हैं. अगर मोहम्मद अहमदीनेजाद जैसा कट्टरपंथी राष्ट्रपति होता तो शायद अब तक युद्ध हो भी चुका होता.

भारत के साथ टैक्स को लेकर भी ट्रंप आंखे दिखाते रहते हैं. वीजा नियमों में भी तमाम बदलाव की बात करते रहे हैं लेकिन बिचारे फंसे रहते हैं. चीन के साथ अमेरिकी तनातनी और ड्रैगन की तेज चालों ने उन्हे भारत को करीब रखने के लिए मजबूर कर रखा है. एशिया में भारत के जैसा मजबूत साथी फिलहाल मिलना मुश्किल है लेकिन इसी साथी के अंदरूनी मामलों में दखल देना, टैक्स से जुड़े मामलों पर आंखे दिखाना, ये दिखाता है कि ट्रंप आखिर ट्रंप क्यों हैं. शायद उनके दिमाग में हमेशा कुछ खुराफती सा चलता रहता है. ऐसे में वो कुछ भी बोल जाते हैं या कर जाते हैं. बस अमेरिकी राष्ट्रपति होने के नाते कभी कभी उन्हें सोचने को भी मजबूर होना पड़ता है. तब वो कुछ ढंग का करने का प्रयास करने का प्रयास करते हैं. ऐसे में वो अस्थिर दिखाई पड़ते हैं. एक बार फिर से सैक्रेड गेम्स का जिक्र करने की जरूरत पड़ती है. शायद गायतोंडे की तरह डॉनल्ड ट्रंप को भी गुरुजी की जरूरत है.